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Budget 2026: बजट में F&O पर बढ़ा टैक्स, क्या अब आर्बिट्राज फंड से नहीं होगी मोटी कमाई? जानिए डिटेल

Published on 02/02/2026 01:57 PM

Budget 2026: बजट 2026-27 में फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) पर सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) बढ़ाए जाने के फैसले ने म्यूचुअल फंड निवेशकों, खासकर 'आर्बिट्राज फंड' (Arbitrage Funds) में निवेश करने वालों की चिंता बढ़ा दी है। हालांकि मल्टी-एसेट फंड्स पर इसका असर तुलनात्मक रूप से सीमित रहने की उम्मीद जताई जा रही है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट 2026 में फ्यूचर्स पर STT को 0.02 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.05 प्रतिशत करने का प्रस्ताव रखा है। इसके साथ ही ऑप्शंस प्रीमियम और ऑप्शन एक्सरसाइज पर STT को 0.10 प्रतिशत से बढ़ाकर 0.15 प्रतिशत कर दिया गया है। इस बदलाव से डेरिवेटिव्स मार्केट में लेनदेन की लागत बढ़ गई है, खासतौर पर उन रणनीतियों के लिए जो बार-बार पोजीशन रोलओवर और चर्निंग पर निर्भर करती हैं।

आर्बिट्राज फंड्स: रिटर्न पर दिखेगा हल्का लेकिन साफ असर

आर्बिट्राज फंड्स आमतौर पर कैश मार्केट में शेयर खरीदकर और उसी शेयर के फ्यूचर कॉन्ट्रैक्ट बेचकर कैश-फ्यूचर प्राइस के अंतर से रिटर्न कमाते हैं। चूंकि इस तरह की ट्रेडिंग बड़े पैमाने पर और नियमित रूप से की जाती है, इसलिए STT में छोटी-सी बढ़ोतरी से भी इनका ट्रांजैक्शन खर्च बढ़ जाएगा और इनके रिटर्म में कमी आएगी।

एडलवाइस म्यूचुअल फंड की बजट के बाद जारी एक नोट के मुताबिक, STT में हुई इस बढ़ोतरी से आर्बिट्राज फंड्स की सालाना रिटर्न पर लगभग 0.32 प्रतिशत अंक का असर पड़ सकता है। यह आकलन इस अनुमान पर लगाया है कि औसतन पोर्टफोलियो का करीब 70 प्रतिशत हिस्सा आर्बिट्राज पोजीशंस में रहता है और लगभग 20 प्रतिशत पोर्टफोलियो में नियमित चर्निंग होती है।

हालांकि यह असर सुनने में छोटा लग सकता है, लेकिन आर्बिट्राज फंड्स के लिए यह काफी अहम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इनके रिटर्न पहले से ही लिक्विड फंड्स के आसपास रहते हैं। टैक्स के बाद आर्बिट्राज और लिक्विड फंड्स के बीच का अंतर अब और सिमटने की संभावना है। अनुमान के अनुसार, अगर लिक्विड फंड्स करीब 7 प्रतिशत का रिटर्न देते हैं, तो टैक्स के बाद आर्बिट्राज और लिक्विड फंड्स के बीच का अंतर लगभग 0.90 प्रतिशत अंक तक सीमित हो सकता है, जो पहले 1.2 प्रतिशत अंक से ज्यादा हुआ करता था।

टैक्स के लिहाज से दोनों में फर्क अब भी बना हुआ है। लिक्विड फंड्स पर रिटर्न 30 प्रतिशत टैक्स स्लैब के तहत आता है, जबकि आर्बिट्राज फंड्स में लंबे समय के निवेश पर 12.5 प्रतिशत की दर से टैक्स लगता है। इसी वजह से आर्बिट्राज फंड्स की टैक्स एफिशियंसी बनी रहती है, भले ही उनके रिटर्न थोड़े कम हो जाए।

मनी हनी फाइनेंशियल सर्विसेज के फाउंडर अनुप भैया का कहना है कि फ्यूचर्स पर STT में तेज बढ़ोतरी से आर्बिट्राज फंड्स की सालाना रिटर्न में करीब 30 बेसिस पॉइंट की कमी आ सकती है। इससे लिक्विड और अल्ट्रा-शॉर्ट फंड्स के मुकाबले उनकी बढ़त कम हो जाएगी। उनके मुताबिक, आर्बिट्राज फंड्स अब भी कम वोलैटिलिटी और टैक्स एफिशिएंसी का लाभ देते हैं, लेकिन लंबे समय के निवेशक संभवतः शॉर्ट-टर्म पार्किंग विकल्पों की बजाय कोर इक्विटी रणनीतियों पर ज्यादा ध्यान देंगे।

मल्टी-एसेट फंड्स पर असर क्यों सीमित

मल्टी-एसेट एलोकेशन फंड्स के मामले में तस्वीर अलग दिखती है। इन फंड्स पर STT बढ़ने का असर सीमित रह सकता है क्योंकि इनका एक्सपोजर केवल डेरिवेटिव्स तक सीमित नहीं होता। बल्कि ये इक्विटी, डेट और गोल्ड जैसे दूसरे वैकल्पिक एसेट्स पर ज्यादा निर्भर करते हैं। इसी वजह से STT बढ़ोतरी का इन पर असर काफी सीमित माना जा रहा है।

एडलवाइस म्यूचुअल फंड के अनुसार, अगर किसी मल्टी-एसेट फंड में औसतन 25 प्रतिशत का आर्बिट्राज एक्सपोजर है, तो STT बढ़ोतरी के चलते इसकी सालाना रिटर्न पर केवल लगभग 0.08 प्रतिशत का प्रभाव पड़ेगा। यह असर इतना छोटा है कि लॉन्ग-टर्म वाले निवेश रणनीतियों पर इसका खास असर नहीं पड़ने की उम्मीद है।

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