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FPI और FIIs ने की 2026 की अब तक की सबसे बड़ी बिकवाली, जानिए आगे कैसी रह सकती है बाजार की चाल

Published on 14/03/2026 07:05 AM

FII Sell-off : एक्सचेंज के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक 13 मार्च, 2026 को विदेशी निवेशकों (FIIs/FPIs) ने भारतीय इक्विटी मार्केट में 10,716 करोड़ रुपये के शेयर बेचे हैं। 28 अक्टूबर 2025 के बाद हुई ये सबसे बड़ी बिकवाली है। इसके विपरीत,घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने 9,977 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे हैं।

कल के ट्रेडिंग सेशन के दौरान,FIIs ने 11,923 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे,लेकिन 22,640 करोड़ रुपये के शेयर बेच भी दिए। वहीं,DIIs ने कुल 22,708 करोड़ रुपये के शेयर खरीदे और 12,730 करोड़ रुपये के शेयर बेच दिए।

FIIs ने इस साल अब तक 107575 करोड़ रुपये के शेयरों की नेट बिक्री की है। जबकि, DIIs ने 168,965 करोड़ रुपये के शेयरों की नेट खरीद की है।

बाजार के प्रदर्शन पर एक नजर

2026 में ग्लोबल वोलैटिलिटी और अनिश्चितताओं के बढ़ने के कारण भारतीय शेयर बाज़ार में भारी गिरावट देखने को मिली है,जिससे सभी सेग्मेंट्स के मार्केट वैल्यू में काफ़ी कमी आई है। जहां निफ्टी साल की शुरुआत से अब तक 11% से ज़्यादा गिरा है,वहीं निफ्टी मिडकैप और स्मॉल कैप इंडेक्स में से हर एक में लगभग 10% की गिरावट आई है। यहां तक कि मार्च में भी अब तक निफ्टी 8% गिरा है, जो मार्च 2020 में महामारी के कारण आई गिरावट के बाद से सबसे बड़ी मासिक गिरावट है।

आने वाले समय में बाज़ार में उतार-चढ़ाव बने रहने की उम्मीद

बाज़ार की चाल पर बात करते हुए मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज़ में वेल्थ मैनेजमेंट रिसर्च हेड,सिद्धार्थ खेमका ने कहा कि आने वाले समय में बाज़ार में उतार-चढ़ाव बने रहने की उम्मीद है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव ऊर्जा संकट पैदा कर रहा है और कच्चे तेल की कीमतों में आग लगी हुई है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुज़रने वाले जहाजों को लेकर बनी अनिश्चितता के कारण निवेशक जोखिम उठाने से बच रहे हैं। ईरान-इज़रायल और अमेरिका से जुड़े इस संघर्ष में अगर कोई कमी आती है तो इससे बाज़ार को राहत मिल सकती है और इक्विटी मार्केट में सुधार आ सकता है। वहीं,अगर यह संघर्ष और बढ़ता है तो बाज़ार पर दबाव बना रह सकता है।

करेंसी मार्केट की चाल

करेंसी मार्केट पर नजर डालें तो भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले एक नए रिकॉर्ड निचले स्तर 92.45 रुपये पर आ गया। इसकी वजह यह रही कि क्रूड की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के कारण निवेशकों का भरोसा कमज़ोर पड़ गया है। इससे भारत के बढ़ते 'करंट अकाउंट डेफिसिट' (चालू खाता घाटा) को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं,क्योंकि भारत अपनी ज़रूरत का लगभग 88% कच्चा तेल आयात करता है।

भारतीय रिज़र्व बैंक ने बाज़ार में उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए डॉलर बेचकर हस्तक्षेप किया। हालांकि,ट्रेडर्स का मानना ​​है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं तो रुपये पर दबाव बना रहेगा। शुक्रवार को भारतीय बाज़ार लगातार तीसरे सत्र में गिरावट के साथ बंद हुए। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, डॉलर इंडेक्स में मज़बूती,विदेशी फंडों की लगातार बिकवाली और कमज़ोर ग्लोबल संकेतों के चलते बेंचमार्क इंडेक्स निफ्टी अपने अहम सपोर्ट लेवल से नीचे गिर गया।

सुरक्षित निवेश विकल्पों की तरफ बढ़ा रुझान

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष के बढ़ने से वैश्विक अनिश्चितता बढ़ गई है और प्रमुख शिपिंग मार्ग बाधित हो गए हैं। इससे ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई है। तेल की बढ़ती कीमत ने महंगाई के दबाव,बढ़ते चालू खाता घाटे और कॉर्पोरेट मार्जिन पर संभावित दबाव को लेकर भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। इसके चलते निवेशकों ने इक्विटी में अपना निवेश कम कर दिया है और सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख कर लिया है।

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इन बातों से तय होगा बाजार का रुख

इन बातों को ध्यान रखते हुए कहा जा सकता है कि आगे बाज़ार की दिशा तय करने में पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष,कच्चे तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव और विदेशी फंडों के रुझान की अहम भूमिका होगी। विदेशी फंडों की निकासी जारी रहने और तेल की कीमतों के ऊंचे स्तर पर बने रहने से बाज़ार का रुख़ सतर्क बना रह सकता है। जबकि भू-राजनीतिक तनाव में कमी के किसी भी संकेत से बाज़ार को राहत मिल सकती है।

 

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