Published on 25/08/2025 11:32 AM
भारत के शेयर बाजारों में पिछले हफ्ते जबरदस्त उछाल देखने को मिला। वजह रही जीएसटी स्ट्रक्चर में बड़े सुधारों का ऐलान और S&P ग्लोबल की ओर से भारत की सॉवरेन रेटिंग में अपग्रेड। इसके बावजूद विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) भारतीय शेयर बाजार से पूंजी निकालते रहे। इस विरोधाभास ने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या विदेशी निवेशक दोबारा भारतीय बाजारों में बड़ी वापसी करेंगे, और अगर हां तो कब?
घरेलू निवेशकों का सहारा
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) के आंकड़ों के मुताबिक, 18 से 22 अगस्त के बीच FIIs ने 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा की बिकवाली की। वहीं इसी दौरान Sensex और Nifty लगभग 1% चढ़े, जबकि BSE MidCap और SmallCap इंडेक्स 2% से ज्यादा उछले। यह बढ़त घरेलू निवेशकों की ओर से लगभग 10,000 करोड़ रुपये की खरीदारी से संभव हुई।
लंबी बिकवाली का सिलसिला
यह बिकवाली कोई नई बात नहीं है। 2024 में FIIs ने ऊंचे वैल्यूएशन, असमान कॉरपोरेट नतीजों और ग्लोबल अनिश्चितताओं का हवाला देते हुए 1.21 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की पूंजी निकाली थी। साल 2025 की शुरुआत से अब तक भी वे 1.57 लाख करोड़ रुपये निकाल चुके हैं।
डीआर चोकसी फिनसर्व के मैनेजिंग डायरेक्टर दिवेन चोकसी का कहना है, “भारतीय बाजार फिलहाल वैल्यूएशन के लिहाज से महंगे हैं। विदेशी निवेशकों को मौजूदा स्तरों पर खास फायदा नहीं दिखता। वे तभी लौटेंगे जब Sensex और Nifty का फॉरवर्ड PE 20 गुना से नीचे आए।” फिलहाल Sensex का PE 20.62x और Nifty का 20.4x है, जो उनके लॉन्ग टर्म औसत से ऊपर है।
ग्लोबल संकेतों का दबाव
कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि विदेशी निवेशकों का मूड केवल घरेलू फैक्टर्स पर नहीं बल्कि ग्लोबल संकेतों पर ज्यादा निर्भर है। अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का आकर्षक स्तर, मजबूत डॉलर और रुपये की कमजोरी ने निवेशकों के हेजिंग खर्च को बढ़ा दिया है, जिससे भारत में नई पूंजी का प्रवाह धीमा पड़ा है।
हाल ही में अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने सितंबर में ब्याज दर घटाने के संकेत दिए हैं, जिससे डॉलर कमजोर हुआ और ट्रेजरी यील्ड गिरी। इसके उलट, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सतर्क मॉनिटरी पालिसी ने घरेलू निवेशकों की उम्मीदों को ठंडा कर दिया।
चॉइस वेल्थ के एवीपी अक्षत गर्ग का कहना है, “अगर ग्लोबल स्तर पर मॉनिटरी पालिसी में नरमी के साफ संकेत मिलते हैं, रुपया स्थिर होता है और कॉरपोरेट अर्निंग्स में लगातार सुधार दिखता है, तो भारत में विदेशी निवेशकों की वापसी संभव है।”
भारत से ध्यान हटा रहे विदेशी निवेशक
बैंक ऑफ अमेरिका की फंड मैनेजर सर्वे रिपोर्ट बताती है कि भारत, जो कुछ महीनों पहले एशिया का सबसे पसंदीदा इक्विटी मार्केट था, अब सबसे कम पसंदीदा बन गया है।
नोमुरा की रिपोर्ट के मुताबिक, 45 बड़े इमर्जिंग मार्केट (EM) फंड्स में से 41 ने जुलाई में भारत में अपनी हिस्सेदारी घटाई। भारत का अलोकेशन MSCI EM बेंचमार्क से 2.9% कम हो गया, जो इस क्षेत्र में सबसे बड़ी गिरावट है। इसके विपरीत हांगकांग, चीन और दक्षिण कोरिया में निवेश बढ़ा है।
कुल मिलाकर विदेशी निवेशकों की स्थायी वापसी तभी होगी जब भारत की ग्रोथ स्टोरी व्यापक स्तर पर कॉरपोरेट अर्निंग्स में झलके और ग्लोबल संकेत अनुकूल हों। फिलहाल, घरेलू निवेशक ही भारतीय बाजारों की मजबूती के असली सहारे बने हुए हैं।
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