Published on 17/02/2026 03:03 PM
Stock Markets: शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव ने इनवेस्टर्स को उलझन में डाल दिया है। एक दिन मार्केट में बड़ी तेजी दिखती है तो दूसरे दिन बड़ी गिरावट आती है। इस वजह से बीते कुछ महीनों में मार्केट के प्रमुख सूचकांक सीमित दायरे में बने हुए हैं। व्हाइटओक कैपिटल मैनेजमेंट की सीनियर फंड मैनेजर तृप्ति अग्रवाल का कहना है यह समय अनुशासन बरतने का है। इसकी वजह यह है कि शॉर्ट टर्म में मार्केट के बारे में कुछ कहना मुश्किल है।
अच्छी कंपनियों के स्टॉक्स पर फोकस करना समझदारी
अग्रवाल ने कहा कि इनवेस्टर्स को मार्केट की दिशा के बारे में अनुमान लगाने की जगह क्वालिटी स्टॉक्स की पहचान करने और सही वैल्यूएशंस पर लंबी अवधि के लिए निवेश करने पर फोकस करना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्हाइटओक की इनवेस्टमेंट स्ट्रेटेजी स्पष्ट है। हम कैपिटल पर बेहतर रिटर्न देने वाली कंपनियों पर फोकस करते हैं। ऐसी कंपनियों पर फोकस करना सही है, जिनका बिजनेस मॉडल स्केलेबल है। इसका मतलब यह कि जिनके बिजनेसेजे के विस्तार की गुंजाइश है। साथ ही जिन कंपनियों ने स्ट्रॉन्ग एग्जिक्यूशन दिखाया है और जिनका गवर्नेंस स्टैंडर्ड अच्छा है।
बैलेंस्ड पोर्टफोलियो सबसे अच्छा रिस्क मैनेजमेंट टूल
व्हाइटओक की स्ट्रेटेजी टॉप-डाउन सेक्टोरल या थीमैटिक निवेश की जगह बॉटम-अप स्टॉक सेलेक्शन के आधार पर पोर्टफोलियो बनाने पर रहा है। अग्रवाल ने कहा कि रिटेल इनवेस्टर्स को यह समझने की जरूरत है कि उनके पोर्टफोलियो के स्टॉक्स बिजनेस फंडामेंटल्स और वैल्यूएशंस के आधार पर चुने गए होने चाहिए। उनका मानना है कि एक बैलेंस्ड पोर्टफोलियो सबसे अच्छा रिस्क मैनेजमेंट टूल है। इससे मार्केट टाइमिंग, करेंसी मूवमेंट्स और सेक्टर रोटेशन का ज्यादा असर नहीं पड़ता है।
बाजार के उतार-चढ़ाव के आधार पर नहीं बदलें स्ट्रेटेजी
उन्होंने कहा कि मार्केट्स को लेकर हमेशा कुछ न कुछ चिंता बनी रहती है। इनमें ग्लोबल रेट साइकिल, कमोडिटी प्राइसेज और पॉलिसी में बदलाव शामिल हैं। इनवेस्टर को सबसे पहले फाइनेंशियल एडवाइजर की सलाह से यह तय करना चाहिए कि शेयरों में उसे कितना निवेश करना चाहिए। उसके बाद अपने निवेश को होल्ड करना चाहिए। मीडिया में आने वाली खबरों या बाजार के उतार-चढ़ाव के आधार पर निवेश की रणनीति बदलने से लंबी अवधि में बड़ा फंड तैयार करना मुश्किल हो जाता है।
एकमुश्त निवेश की जगह सिप से निवेश करने में ज्यादा फायदा
अग्रवाल का कहना है कि ज्यादातर रिटेल इनवेस्टर्स के लिए एकमुश्त निवेश की जगह SIP से निवेश करना समझदारी है। इससे निवेश पर मार्केट के फेजेज का असर नहीं पड़ता है। सिप के जरिए शेयरों में पैसा धीरे-धीरे जाता है, जिससे हाई लेवल पर ज्यादा निवेश जैसा रिस्क घट जाता है। हालांकि, उन्होंने कहा कि उतार-चढ़ाव और सीमित दायरे वाले बाजार में सिप से लंबी अवधि के रिटर्न पर मिलने वाला रिटर्न मीडियम रह सकता है। लेकिन, इतिहास बताता है कि शुरुआती सालों में सिप से निवेश का रिटर्न औसत रह सकता है, लेकिन लंबी अवधि में यह काफी बेहतर रहता है।
इनकम बढ़ने के साथ सिप टॉप-अप का करें इस्तेमाल
उन्होंने निवेशकों को सिप टॉप-अप का इस्तेमाल करने की भी सलाह दी। इस तरीके से इनवेस्टर अपनी इनकम बढ़ने के साथ-साथ अपना निवेश बढ़ा सकता है। इससे लॉन्ग टर्म में कंपाउंडिंग का ज्यादा फायदा मिलता है। खासकर नौकरी करने वाले इनवेस्टर्स हर साल सैलरी में इंक्रीमेंट के बाद सिप से निवेश के अमाउंट को बढ़ा सकते हैं। लंबी अवधि में इसका बड़ा असर पड़ता है।हिंदी में शेयर बाजार, स्टॉक मार्केट न्यूज़, बिजनेस न्यूज़, पर्सनल फाइनेंस और अन्य देश से जुड़ी खबरें सबसे पहले मनीकंट्रोल हिंदी पर पढ़ें. डेली मार्केट अपडेट के लिए Moneycontrol App डाउनलोड करें।